पदमश्री मोहन स्वरूप भाटिया की एक व्यथा
मथुरा: ब्रज की लोक संस्कृति, साहित्य और लोकगीतों के संरक्षण में दशकों के योगदान के लिए पदमश्री से सम्मानित मोहन स्वरूप भाटिया देश की राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मु के तीन दिवसीय मथुरा-वृंदावन कार्यक्रम को यादगार तो बताया लेकिन वे कहते हैं कि काश ! राष्ट्रपति ‘चरकुला नृत्य ‘- ‘हल नृत्य’ देख पातीं ! दर्शन कर पाती रास में ‘राधा- कृष्ण के !!

वे कहते हैं कि राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मु ने सपरिवार तीन दिवसीय यात्रा में ब्रज के प्राचीन मन्दिरों , धार्मिक स्थलों, सन्त -महन्तों आदि के दर्शन किए। गोल्फ कार्ट पर बैठकर गिरि गोवर्धन की परिक्रमा लगाई। कम समय में और बहुत कुछ देखा किन्तु न तो कृष्ण की आराधिका राधा जी की जन्म भूमि ‘रावल ‘के दर्शन किए और न महान सन्त कविवर सूरदास की परासौली स्थित सूनी ‘सूर कुटी’ के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त किया |
और वहाँ जहाँ ब्रज के आँसू छलकते हैं !
सम्पूर्ण देश के अधिकांश भक्तजन श्रद्धा पूर्वक यमुना पूजन तथा यमुना स्नान के लिए आते हैं। यम द्वितीया पर्व पर तो लाखों भाई-बहिन यमुना स्नान के लिए आते हैं और हाथ पकड़ कर स्नान करते हैं। विश्वास किया जाता है कि यम द्वितीया के दिन भाई-बहिन हाथ पकड़ कर स्नान करें तो उन्हें यम लोक नहीं जाना पड़ता है। भाई के साथ तो महामहिम स्नान अथवा जल पान तो दूर यमुना के विश्राम घाट पर जाकर न तो उन्होंने यमुना पूजन किया और न प्रदूषित यमुना की स्थिति देख सकीं| काश! महामहिम के कार्यक्रम में यमुना दर्शन का कार्यक्रम होता तो शायद उत्तर प्रदेश शासन यमुना प्रदूषण मुक्ति के लिए सजग हो उठता।
न- चमत्कारी ‘चरकुला’ न ‘हल नृत्य’
ब्रज रस- रंग की भूमि होली की भूमि है, रासलीला की भूमि है , सैकड़ों दीपकों से जगमगाते चमत्कारी ‘चरकुला’ नृत्य की भूमि है। यह उस अविश्वसनीय विलक्षण हल- नृत्य की भूमि है जिसमें एक ब्रजांगना घूँघट की ओट में खेत में चलने वाले वजनी हल को दांतों में दबाकर तथा हाथ छोड़कर नत्य करती है। राष्ट्रपति महोदया को उपरोक्त नृत्य देखने का सौभाग्य प्राप्त होता तो उनकी स्तुति पर ये नृत्य विश्व पटल पर ब्रज की कीर्ति पताका फहराते | राष्ट्रपति महोदया का जन्म मयूरभंज नामक स्थान में हुआ था| वह रासलीला में मनमोहक मयूर नृत्य देखती तो जन्मभूमि की स्मृति जागृत हो उठती |


